रामायण काल से जुड़ा हुआ है मधुबनी पेंटिंग का इतिहास, अंग्रेज़ों से हुयी थी इस मिथिला कला की दुनिया में पहचान: मिथिला पेंटिंग के विशेषज्ञ स्टेट अवार्डी प्रतीक प्रभाकर बताते हैं कि तुलसीदास ने रामायण में मिथिला पेंटिंग की पुष्टि की है. वे कहते हैं कि जब भगवान राम और सीता की शादी का जिक्र आता है, तब इस बात का तुलसीदास जी ने वर्णन किया है कि घरों की दीवारों पर पेंटिंग बनाई गई है. लेकिन इनका मानना है कि शायद उससे भी पुराना इस पेंटिंग का इतिहास हो सकता है. 1934 के भूकंप के बाद अंग्रेजों ने जाना मिथिला पेंटिंग को.

अंग्रेज ऑफिसर के आर्टिकल के बाद हुई छानबीन: एसडीओ विलियम जॉर्ज आर्चर नेइस क्षेत्र में घर-घर में होने वाले इस पेंटिंग का मुआयना किया और फोटोग्राफी की. मिथिला पेंटिंग से वे काफी प्रभावित हुए थे. ऐसा कहा जाता है कि सिर्फ इस पेंटिंग के बारे में जानने के लिए वे अगले छह साल तक यहां आते रहे. इसके बाद उन्होंने मिथिला पेंटिंग पर एक आर्टिकल लिखा. इसके बाद जिसके भारत सरकार की कल्चरल एडवाइजर ने इस पेंटिंग की बारीकी को जानने के लिए एक प्रसिद्ध विशेषज्ञ भास्कर कुलकर्णी को भेजा.
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जगदम्बा देवी पहली महिला थीं, जिन्हें मिथिला पेंटिंग के लिए पद्मश्री अवार्ड से समन्नित किया गया. फिर सीता देवी, गंगा देवी और ऐसे 7 लोगों को मिथिला पेंटिंग चित्र कला के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि मिथिला पेंटिंग का इतिहास महज कुछ वर्षों का है या फिर इसका कनेक्शन पौराणिक काल से है. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं कि मिथिला पेंटिंग का इतिहास कम से कम रामायण काल से तो जरूर ही है. देश और दुनिया में मशहूर हो चुके मिथिला पेंटिंग का वर्णन तुलसीदास चरित रामायण में हूबहू है.